दशहरे पर यहां नहीं जलता रावण, होती है लंकेश की पूजा; पंजाब के इस गांव की 190 साल पुरानी परंपरा जानकर रह जाएंगे हैरान

दशहरे पर यहां नहीं जलता रावण, होती है लंकेश की पूजा; पंजाब के इस गांव की 190 साल पुरानी परंपरा जानकर रह जाएंगे हैरान

देशभर में दशहरे के दिन रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन पंजाब के लुधियाना जिले के पायल कस्बे के एक गांव में दशहरे की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है। यहां रावण का पुतला जलाने के बजाय उसकी पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में करीब 190 साल पुरानी परंपरा चली आ रही है, जो इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है।

मंदिर परिसर में रावण की लगभग 25 फीट ऊंची पक्की प्रतिमा स्थापित है। दशहरे के अवसर पर श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा करते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। आखिर क्या है इस परंपरा के पीछे की कहानी और क्यों यहां रावण दहन नहीं किया जाता? आइए जानते हैं।

आखिर क्यों नहीं जलाया जाता यहां रावण?

दशहरा भगवान श्रीराम की ओर से रावण के वध और बुराई पर अच्छाई की जीत की याद में मनाया जाता है। इस अवसर पर देश के अधिकांश हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं।

हालांकि, पंजाब के इस गांव में प्रचलित परंपरा अलग है। यहां रावण की प्रतिमा को जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। स्थानीय लोगों की धार्मिक मान्यताओं और मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक कथा को इस परंपरा का आधार माना जाता है।

मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यहां रावण की पूजा का उद्देश्य उसके गलत कार्यों का समर्थन करना नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को याद करना है। स्थानीय मान्यता में रावण को एक विद्वान और वेदों का ज्ञाता भी माना जाता है।

संतान प्राप्ति की मान्यता से जुड़ी है मंदिर की कहानी

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास हकीम बीरबल दास से जुड़ा हुआ है। मंदिर के पुजारी समर लाल के हवाले से बताया जाता है कि हकीम बीरबल दास की दो शादियां हुई थीं, लेकिन उन्हें संतान प्राप्त नहीं हुई।

कहा जाता है कि इसके बाद उन्होंने संन्यास ले लिया था। बाद में एक संत से मुलाकात के बाद उन्हें श्रीरामलीला आयोजित करने और पारिवारिक जीवन में लौटने की प्रेरणा मिली।

स्थानीय कथा के अनुसार, इसके बाद उनके परिवार में पुत्र का जन्म हुआ। इसी घटना को मंदिर की धार्मिक मान्यता और रावण पूजा की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

हालांकि, यह मंदिर से जुड़ी स्थानीय धार्मिक कथा है। इसके ऐतिहासिक विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर की जानी चाहिए।

25 फीट ऊंची पक्की प्रतिमा है खास पहचान

इस मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में रावण की लगभग 25 फीट ऊंची पक्की प्रतिमा शामिल है। आमतौर पर दशहरे पर रावण के पुतले तैयार किए जाते हैं और उत्सव के दिन उनका दहन किया जाता है। लेकिन यहां प्रतिमा को हर साल जलाने की परंपरा नहीं है।

स्थानीय जानकारी के मुताबिक, दशहरे से पहले प्रतिमा की साफ-सफाई और रंग-रोगन किया जाता है। पर्व के दिन श्रद्धालु इसके सामने पूजा-अर्चना करते हैं।

यह प्रतिमा मंदिर की पहचान के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र भी मानी जाती है।

संतान प्राप्ति की मनोकामना लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु

मंदिर से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण की प्रतिमा के सामने पूजा करने से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी हो सकती है। इसी विश्वास के चलते कुछ श्रद्धालु मंदिर में पहुंचकर प्रार्थना करते हैं और मन्नत मांगते हैं।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि संतान प्राप्ति से जुड़ा यह विश्वास धार्मिक आस्था पर आधारित है। इसके प्रभाव का कोई स्थापित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

फिर भी, ऐसी स्थानीय परंपराएं यह दिखाती हैं कि अलग-अलग क्षेत्रों में धार्मिक आस्थाएं और त्योहारों को मनाने के तरीके किस तरह विविध हो सकते हैं।

मंदिर की कुछ पूजा परंपराएं भी हैं अलग

मंदिर से जुड़ी कुछ स्थानीय धार्मिक प्रथाओं का भी उल्लेख मिलता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, कुछ श्रद्धालुओं की ओर से प्रतिमा पर शराब या बकरे के खून का चढ़ावा चढ़ाने जैसी प्रथाओं का दावा किया गया है।

हालांकि, इन प्रथाओं की वर्तमान स्थिति और व्यापकता की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। यह मानना भी सही नहीं होगा कि मंदिर आने वाले सभी श्रद्धालु ऐसी परंपराओं का पालन करते हैं।

मंदिर से जुड़ी धार्मिक गतिविधियों के बारे में जानकारी देते समय स्थानीय मान्यताओं और सत्यापित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।

क्या श्रीलंका से भी जुड़ा है मंदिर?

मंदिर को धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने और इसके संरक्षण को लेकर श्रीलंका की ओर से तकनीकी तथा वित्तीय सहयोग के प्रस्ताव की चर्चा भी सामने आई है।

इसके अलावा, मंदिर को रामायण सर्किट से जोड़ने और धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की संभावनाओं का भी उल्लेख किया जाता रहा है।

हालांकि, किसी औपचारिक समझौते, सरकारी मंजूरी या परियोजना की वर्तमान स्थिति की पुष्टि के लिए संबंधित विभागों के आधिकारिक दस्तावेज जरूरी हैं। यदि ऐसी योजना को मंजूरी मिलती है और उस पर काम आगे बढ़ता है, तो इससे मंदिर की ऐतिहासिक तथा धार्मिक पहचान को व्यापक स्तर पर सामने लाने में मदद मिल सकती है।

रावण दहन की जगह पूजा, क्या है इसके पीछे का संदेश?

मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यहां रावण की पूजा का अर्थ उसके सभी कार्यों को सही ठहराना नहीं है। इस परंपरा के पीछे यह विचार बताया जाता है कि इंसान को अपनी बुराइयों पर विजय पाने का प्रयास करना चाहिए।

स्थानीय मान्यता में रावण के विद्वान होने और उसके गलत कर्मों के बीच अंतर किया जाता है। इसी दृष्टिकोण के साथ यहां दशहरे पर प्रतिमा का दहन करने के बजाय उसकी पूजा की जाती है।

हालांकि, रावण के प्रति धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग हो सकते हैं। कहीं उसे बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, तो कुछ स्थानीय परंपराओं में उसके विद्वत्ता संबंधी पहलुओं को भी महत्व दिया जाता है।

पंजाब की यह परंपरा क्यों है खास?

पंजाब के इस गांव में दशहरे के दौरान रावण की पूजा की परंपरा भारतीय संस्कृति की क्षेत्रीय विविधता को सामने लाती है। एक ही पर्व को अलग-अलग समुदाय अपनी ऐतिहासिक कथाओं, धार्मिक विश्वासों और स्थानीय परंपराओं के आधार पर अलग तरीके से मनाते हैं।

जहां अधिकांश जगहों पर रावण दहन दशहरे का प्रमुख आकर्षण होता है, वहीं इस गांव में स्थापित प्रतिमा और उससे जुड़ी पूजा की परंपरा लोगों का ध्यान खींचती है।

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